आध्यात्मिक ज्ञान
माला में 108 दाने ही क्यों होते हैं? इसके पीछे क्या कारण और रहस्य है?
लेखक: श्री राजेन्द्र दास जी महाराज
23 October 2026
संक्षिप्त उत्तर
माला में 108 दाने रखने के पीछे श्वासों की संख्या, नाम-जप, 27 नक्षत्रों और चारों दिशाओं से जुड़े पारंपरिक आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं।
विस्तृत उत्तर
1. प्रत्येक मनुष्य 24 घंटेमें 21600 श्वास लेता है। यदि हम दिन का अधिकांश समय सांसारिक कार्यों के लिए निकाल दें तो भी 108 श्वास कम से कम भजन में लगने ही चाहिए। यदि हम कम से कम एक श्वासमें एक बार ही नाम जप करना चाहें तो 108 नामों का विधिवत् उपांशु जप करने पर 10800 नाम जप हो जाता है। क्योंकि मनुस्मृति में उपांशु जप को सौ गुना कहा है 'उपांशु स्यात् शतगुणः (2/85)। अतः दोनों सन्ध्याओं में एक एक माला जप करने पर 10800 X 2 = 21600 नाम जप हो जाते हैं। इस प्रकार एक श्वास में एक बार नाम लेनेका औसत पूरा करके श्वासों को सार्थक कर लेते हैं। अतः माला में 108 दाने ही रखना ठीक होगा।
2. हमारे ब्रह्माण्ड मे 27 नक्षत्रों की माला चारों दिशाओं में सुमेरु पर्वत के सहारे घूमती है। अतः ऋषियों ने भी नक्षत्रों की माला के चारों दिशाओं में घूमनेके कारण चार से गुणा करके 27 X 4 = 108 दानों की माला और उसमें एक सुमेरु लगाकर नक्षत्र माला के समान अपनी माला भी 108 दाने तथा एक सुमेरु वाली बनाई है। प्रत्येक नक्षत्र के ज्योतिषशास्त्र में चू चे चो ला आदि चार अक्षर होते हैं। उन्हें नक्षत्रों की संख्या 27 से गुणा करने पर भी 108 दाने ही होते हैं।
श्री 108 - प्रसङ्गतः यहाँ श्री 108 लिखने का रहस्य बताना भी आवश्यक हो जाता है। इस ब्रह्माण्ड में ग्रहों से भी ऊँचे नक्षत्रो की स्थिति है। अतः हम जिन्हें उच्च पद प्रदान करते हैं उन्हें नक्षत्रों की संख्या (27) से जोडते हैं। नक्षत्रों की तरह चारों दिशाओं में भ्रमण करने वाले महापुरुषों के साथ भी 27 नक्षत्र तथा 4 दिशाओं को गुणित करके 27 X 4 = 108 श्री लिखते हैं। ब्रह्म शब्दमें ब् र् ह् म् ये चार अक्षर हैं। क से ब तक 23 अक्षर होते हैं, एवं क से र तक 27 और क से ह तक 33 तथा क से म तक 25 अक्षर होते हैं। इस प्रकार 23 +27+33+ 25 त्र 108 अक्षर ब्रह्म शब्द में समाये हुए हैं। अर्थात् ब्रह्म शब्द 108 अक्षरों की स्मृति कराने वाला है। ऐसे ब्रह्म की प्राप्ति में सहायक होने से मालामें 108 दाने तथा महापुरुषों के साथ 108 श्री लिखते हैं।
स्रोत: उपासना दर्पण - पूज्य श्री राजेन्द्र दास जी महाराज
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