श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीकृष्ण ने गीता में मन को वश में करने का उपाय क्या बताया?

प्रकाशित: 10 October 2026
श्रीकृष्ण ने गीता में मन को वश में करने का उपाय क्या बताया?
क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि आप भगवान का नाम लेने बैठते हैं, लेकिन कुछ ही क्षणों में मन कभी बीते हुए कल की बातों में चला जाता है, कभी भविष्य की चिंता करने लगता है और कभी किसी अनचाही इच्छा में उलझ जाता है?

राधे राधे!

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में मन को वश में करने का उपाय क्या बताया?


क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि आप भगवान का नाम लेने बैठते हैं, लेकिन कुछ ही क्षणों में मन कभी बीते हुए कल की बातों में चला जाता है, कभी भविष्य की चिंता करने लगता है और कभी किसी अनचाही इच्छा में उलझ जाता है?

हम मन को शांत करना चाहते हैं, लेकिन मन बार-बार भटकता है। कई बार हम स्वयं को दोष देने लगते हैं कि शायद हमारी साधना में कमी है।

श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण के सामने मन की इसी कठिनाई को रखा था। विशेष बात यह है कि श्रीकृष्ण ने मन की चंचलता को नकारा नहीं, बल्कि उसे साधने का मार्ग बताया।

आइए, गीता के दो महत्वपूर्ण श्लोकों के माध्यम से समझें कि मन को नियंत्रित करने के लिए अभ्यास और वैराग्य का क्या महत्व है।

1. गीता में मन को वापस लाने की शिक्षा

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं:

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता  6.26)
सरल भावार्थ: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटक जाए, वहाँ से इसे वापस लाकर आत्मा में स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिए।

इस श्लोक की एक महत्वपूर्ण बात है—मन का भटकना साधना के अंत का संकेत नहीं है। श्रीकृष्ण का निर्देश है कि जब मन भटके, तब उसे फिर से वापस लाया जाए।

उदाहरण के लिए, आप नाम-जप कर रहे हैं और अचानक किसी पुराने विवाद की याद आने लगती है। आपको इसका एहसास होता है। अब आप उस विचार से लड़ने या स्वयं को बुरा कहने के बजाय धीरे से अपना ध्यान फिर से भगवान के नाम पर ले आते हैं। यही लौटने का अभ्यास है।

एक बार ध्यान भटकने के बाद वापस लाना असफलता नहीं है। अभ्यास का अवसर वहीं से शुरू होता है।

2. अर्जुन ने भी मन को कठिन बताया था

गीता के छठे अध्याय में अर्जुन मन को चंचल और नियंत्रित करना कठिन बताते हैं। इसके उत्तर में श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं कि मन को वश में करना वास्तव में कठिन है, लेकिन असंभव नहीं।

(श्रीभगवानुवाच)
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 6.35)

सरल भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन निस्संदेह चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

इस श्लोक में दो उपाय बताए गए हैं—अभ्यास और वैराग्य।

आइए, दोनों को दैनिक जीवन के उदाहरणों से समझें।

3. अभ्यास का अर्थ क्या है?

अभ्यास का अर्थ है किसी उचित साधना या लक्ष्य की ओर बार-बार लौटना।

यदि आपने प्रतिदिन कुछ समय नाम-जप करने का निश्चय किया है, तो मन के भटकने पर भी धैर्यपूर्वक नाम-स्मरण जारी रखें। यदि आप ध्यान करना चाहते हैं, तो अपनी क्षमता के अनुसार नियमित समय निर्धारित करें।

अभ्यास का अर्थ यह नहीं है कि पहले दिन से ही मन पूरी तरह शांत हो जाए। इसका अर्थ है कि आप बार-बार प्रयास करते रहें और धीरे-धीरे अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित बनाएँ।

एक सरल उदाहरण: कोई व्यक्ति प्रतिदिन दस मिनट श्रीहरि का नाम लेने बैठता है। पहले दिन उसका मन बार-बार भटकता है। अगले दिन भी ऐसा ही होता है। फिर भी वह धैर्यपूर्वक अपना अभ्यास जारी रखता है।

यहाँ उद्देश्य मन के हर विचार को जबरन रोकना नहीं, बल्कि ध्यान को अपने चुने हुए साधना-विषय पर वापस लाना है।

4. वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं

वैराग्य शब्द को कई बार संसार, परिवार और जिम्मेदारियों को छोड़ देने के अर्थ में समझ लिया जाता है। लेकिन इस श्लोक के संदर्भ में वैराग्य को आसक्ति और अनावश्यक खिंचाव से दूरी बनाने के अभ्यास के रूप में भी समझा जा सकता है।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने आपका अपमान किया। आप बार-बार उसी घटना को याद करते हैं और मन में उसका उत्तर देते रहते हैं। इससे आपकी शांति और वर्तमान के काम प्रभावित होते हैं।

ऐसी स्थिति में वैराग्य का व्यावहारिक अर्थ यह हो सकता है कि आप उचित कदम उठाएँ, आवश्यकता हो तो अपनी बात स्पष्ट करें, लेकिन उस घटना को पूरे दिन अपने मन पर हावी न होने दें।

इसी तरह, धन, प्रशंसा या सफलता की इच्छा होना अपने-आप में गलत नहीं है। समस्या तब बढ़ सकती है जब इनकी चिंता हमारे हर निर्णय और मन की शांति पर हावी हो जाए।

अभ्यास मन को सही दिशा में लौटाना सिखाता है, जबकि वैराग्य अनावश्यक आसक्ति को पहचानने में सहायता करता है।

5. नाम-जप करते समय मन भटके तो क्या करें?

यदि आप श्रीहरि का नाम-जप करते हैं, तो इन पाँच सरल चरणों को आजमा सकते हैं।

पहला चरण — एक सरल लक्ष्य चुनें।
अपनी सुविधा के अनुसार कुछ मिनट नाम-स्मरण के लिए निर्धारित करें।

दूसरा चरण — मन के भटकने को पहचानें।
जब ध्यान किसी विचार में चला जाए, तो उसे पहचानें। स्वयं को दोष देने की आवश्यकता नहीं।

तीसरा चरण — ध्यान वापस लाएँ।
धीरे से फिर अपने चुने हुए नाम या मंत्र पर ध्यान दें।

चौथा चरण — नियमितता बनाए रखें।
कभी अधिक और कभी कम समय मिलने पर भी अपनी दिनचर्या को यथासंभव नियमित रखें।

पाँचवाँ चरण — व्यवहार में भी साधना उतारें।
दिन भर अपने वचन, क्रोध, जिम्मेदारियों और दूसरों के प्रति व्यवहार पर ध्यान दें।

ये चरण गीता की शिक्षा को दैनिक जीवन में अपनाने का एक व्यावहारिक तरीका हैं। इन्हें किसी चमत्कारी उपाय या तुरंत परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।

6. मन को साधने की यात्रा में धैर्य क्यों जरूरी है?

हम कई बार चाहते हैं कि कुछ दिन की साधना के बाद मन हमेशा शांत रहने लगे। लेकिन मनुष्य का मन विचारों, अनुभवों, इच्छाओं और चिंताओं से प्रभावित होता रहता है।

इसलिए अपनी प्रगति को केवल इस आधार पर न मापें कि ध्यान के दौरान कितने विचार आए। यह भी देखें कि क्या आप अपने ध्यान को वापस लाना सीख रहे हैं, क्या आप अनावश्यक प्रतिक्रिया देने से पहले रुक पाते हैं और क्या अपने कर्तव्यों को अधिक सजगता से निभा रहे हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता गीता के इन श्लोकों से मिलने वाली मुख्य सीख यही है कि मन को साधने में निरंतर प्रयास और अनावश्यक आसक्ति से दूरी—दोनों महत्वपूर्ण हैं।

यदि चिंता या बेचैनी लगातार बनी रहती है और दैनिक जीवन को प्रभावित करती है, तो आध्यात्मिक अभ्यास के साथ उपयुक्त पेशेवर सहायता लेना भी उचित है।

निष्कर्ष

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण मन को नियंत्रित करने का मार्ग बताते हुए अभ्यास और वैराग्य का महत्व समझाते हैं तथा भटके हुए मन को बार-बार वापस लाने की शिक्षा देते हैं।

इसलिए अगली बार जब नाम-जप करते समय आपका मन भटक जाए, तो निराश होकर साधना छोड़ने के बजाय धैर्यपूर्वक अपना ध्यान वापस लाने का प्रयास करें।

आज अपने लिए एक छोटा-सा संकल्प लें—कुछ मिनट नियमित नाम-स्मरण करेंगे और जब मन भटकेगा, तो उसे बिना स्वयं को दोष दिए वापस लाएँगे।

श्रीहरि का स्मरण आपके जीवन में धैर्य, विवेक और सद्कर्म की प्रेरणा बनाए रखे।
राधे राधे!
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प्रामाणिक संदर्भ

1. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 26।
2. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 35।