श्रीमद्भगवद्गीता

मन की अशांति दूर कैसे करें? श्रीहरि भक्ति और गीता से सीखें 5 बातें

प्रकाशित: 09 October 2026
मन की अशांति दूर कैसे करें? श्रीहरि भक्ति और गीता से सीखें 5 बातें
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 12 की शिक्षा से समझें कि भक्ति, आत्मचिंतन और दैनिक जीवन के छोटे अभ्यास मन को संतुलित रखने में कैसे सहायक हो सकते हैं।
राधे राधे!
मन की अशांति दूर कैसे करें? श्रीहरि भक्ति और गीता से सीखें 5 बातें

कभी-कभी जीवन में सब कुछ ठीक दिखाई देता है, फिर भी मन बेचैन रहता है। परिवार की चिंता, भविष्य का डर, दूसरों से तुलना और बीती हुई बातों का बोझ हमें वर्तमान में भी प्रसन्न नहीं रहने देता। ऐसे समय में मनुष्य सोचता है कि आखिर मन को सच्ची शांति कैसे मिले?

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इस प्रश्न का उत्तर केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने में नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को सुधारने में भी मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता हमें मन को समझने, अपने कर्तव्य निभाने और कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

इस लेख में हम गीता की एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा को समझेंगे और पाँच ऐसे अभ्यास जानेंगे जिन्हें अपने दैनिक जीवन में अपनाया जा सकता है।

1. हर बात को अपने मन पर हावी न होने दें

हमारा मन अक्सर उन बातों को बार-बार दोहराता रहता है जो हमें परेशान करती हैं। किसी ने कुछ कह दिया, कोई काम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ या भविष्य को लेकर कोई आशंका पैदा हो गई—हम उन्हीं विचारों में उलझे रह सकते हैं।

ऐसी स्थिति में सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं होती। लेकिन उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया को समझने और सुधारने का प्रयास हम कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी काम में असफलता मिलती है, तो स्वयं को दोष देते रहने के बजाय यह विचार करें कि अगली बार क्या बेहतर किया जा सकता है।

यह दृष्टिकोण समस्या को नकारना नहीं है। इसका उद्देश्य समस्या का सामना करते समय अपने मन को अनावश्यक बोझ से बचाना है।

2. श्रीमद्भगवद्गीता की इस शिक्षा को समझें

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अपने प्रिय भक्त के गुणों का वर्णन करते हुए बताया है कि जो व्यक्ति द्वेष से दूर रहता है, सभी के प्रति मैत्री और करुणा रखता है तथा सुख-दुःख में संतुलित रहने का प्रयास करता है, वह भगवान को प्रिय है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
--- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 12, श्लोक 13–14

सरल भावार्थ: जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रता और करुणा रखता है, अहंकार से दूर रहता है, सुख-दुःख में संतुलित रहता है और अपना मन-बुद्धि भगवान को समर्पित करता है, ऐसा भक्त भगवान को प्रिय है।

इस शिक्षा पर विचार करने से एक महत्त्वपूर्ण बात समझ आती है। भक्ति केवल पूजा करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसका प्रभाव हमारे व्यवहार, वाणी और दूसरों के प्रति दृष्टिकोण में भी दिखाई देना चाहिए।

यदि हम भगवान का नाम लेते हैं, लेकिन छोटी-छोटी बातों पर दूसरों के प्रति द्वेष रखते हैं, तो हमें अपने व्यवहार पर भी चिंतन करना चाहिए।

3. नाम-जप को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ

श्रीहरि का स्मरण भक्तिमार्ग का एक सरल और महत्त्वपूर्ण अभ्यास है। इसके लिए किसी विशेष स्थान या बहुत लंबा समय होना अनिवार्य नहीं है। अपनी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार प्रतिदिन कुछ समय निकाला जा सकता है।

सुबह उठकर शांत स्थान पर बैठें। अपनी श्रद्धा के अनुसार श्रीकृष्ण, श्रीराम या श्रीहरि का नाम लें। मन में विचार आएँ, तो परेशान होने के बजाय धीरे-धीरे ध्यान फिर नाम-स्मरण की ओर ले आएँ।

आप चाहें तो अपने दिन की शुरुआत इस छोटे-से संकल्प से कर सकते हैं:

“आज मैं अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने, अपनी वाणी को मधुर रखने और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने का प्रयास करूँगा।”

नाम-जप को श्रद्धा, नियमितता और आत्मचिंतन के अभ्यास के रूप में अपनाएँ।

4. दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने कर्तव्य पर ध्यान दें

कई बार हमारी अशांति का कारण अपनी परिस्थितियों की तुलना दूसरों के जीवन से करना होता है। किसी की सफलता देखकर हम अपने प्रयासों को छोटा समझने लगते हैं। किसी की आर्थिक स्थिति देखकर अपने जीवन से असंतुष्ट हो जाते हैं।

लेकिन हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, जिम्मेदारियाँ और जीवन की यात्रा अलग होती है।

इसलिए अपनी प्रगति को केवल दूसरों से तुलना करके न आँकें। स्वयं से पूछें:

- क्या मैं अपनी जिम्मेदारियाँ ईमानदारी से निभा रहा हूँ?
- क्या मैं अपनी गलतियों से कुछ सीख रहा हूँ?
- क्या मेरे व्यवहार में पहले से अधिक धैर्य और विनम्रता आ रही है?

इन प्रश्नों के उत्तर आपको अपने सुधार की दिशा समझने में मदद कर सकते हैं।

आध्यात्मिक जीवन का अर्थ संसार के कर्तव्यों से दूर होना नहीं है। परिवार की देखभाल करना, अपना काम ईमानदारी से करना और जरूरतमंद की सहायता करना भी जिम्मेदार जीवन का हिस्सा है।

5. क्षमा और करुणा का अभ्यास करें

किसी के व्यवहार से दुख पहुँचना स्वाभाविक है। लेकिन यदि हम उस घटना को बार-बार याद करके अपने भीतर क्रोध बढ़ाते रहते हैं, तो वर्तमान का समय भी प्रभावित हो सकता है।

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि गलत व्यवहार को सही मान लिया जाए या स्वयं को बार-बार चोट पहुँचाने की अनुमति दी जाए। आवश्यकता पड़ने पर उचित दूरी और अपनी सीमाएँ बनाए रखना भी जरूरी है।

क्षमा का अभ्यास करने का एक तरीका है कि किसी विवाद के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय रुकें। फिर सोचें कि समस्या को शांतिपूर्वक और उचित तरीके से कैसे सुलझाया जा सकता है।

भगवान की भक्ति से प्रेरणा लेकर जब हम दूसरों के प्रति करुणा विकसित करने का प्रयास करते हैं, तब हमारे संबंधों में भी सकारात्मक बदलाव की संभावना बनती है।

निष्कर्ष: भक्ति को जीवन में उतारना ही असली अभ्यास है

मन की शांति की यात्रा एक दिन में पूरी नहीं होती। इसके लिए धैर्य, आत्मचिंतन और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है।

राधे राधे!

आपको गीता की यह शिक्षा कैसी लगी? अपने विचार साझा करें और MereHari पर भक्ति, संतों की शिक्षाओं तथा आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़े अन्य लेख भी पढ़ें।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता